छिंदवाड़ा में ईको-फ्रेंडली होली की मिसाल: संतोषी माता मंदिर और रामलीला मंच पर भव्य आयोजन , 16 फीट भव्य पुतला बना आकर्षण।

🔴 छिंदवाड़ा मेट्रो सिटी मीडिया डेस्क|
छिंदवाड़ा जिले के संतोषी माता मंदिर प्रांगण तथा छोटी बाजार स्थित रामलीला रंगमंच में फाल्गुन मास के अवसर पर पारंपरिक एवं पर्यावरण-संवेदनशील होलिका उत्सव का आयोजन किया जा रहा है। स्थानीय श्री संतोषी माता जनकल्याण समिति और श्री होली उत्सव समिति, छोटी बाजार द्वारा अलग-अलग स्थलों पर आयोजित इन कार्यक्रमों में धार्मिक विधि-विधान, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखते हुए होलिका पूजन एवं दहन की तैयारियां और आयोजन क्रमवार संपन्न हुए।
मौके पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार संतोषी माता मंदिर परिसर में होली पर्व वर्षों से चली आ रही परंपरा के तहत लकड़ी के स्थान पर गाय के गोबर से निर्मित कंडों (उपलों) से होलिका दहन कर मनाया गया। समिति पदाधिकारियों ने बताया कि यह निर्णय पेड़ों की कटाई को कम करने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया है। ट्रस्ट सचिव अंशुल शुक्ला के अनुसार संस्था लंबे समय से ईको-फ्रेंडली होली की परंपरा को बनाए हुए है, जिससे धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का व्यावहारिक संदेश समाज तक पहुंचता है।
कार्यक्रम की शुरुआत मंदिर प्रांगण में विधिवत होलिका पूजन से हुई, जहां श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना कर हवन सामग्री अर्पित की। निर्धारित धार्मिक रीति के अनुसार होलिका दहन के दौरान पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में परिवर्तित रहा। दहन उपरांत ग्रामीण कलाकारों ने ढोलक और मंजीरों की थाप पर पारंपरिक फाग गायन प्रस्तुत किया, जिससे सांस्कृतिक उत्साह और जनसहभागिता स्पष्ट रूप से देखने को मिली। आयोजन में रासायनिक रंगों के बजाय प्राकृतिक गुलाल का उपयोग किया गया और श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को तिलक लगाकर पर्व की शुभकामनाएं दी।
इसी क्रम में छोटी बाजार रामलीला रंगमंच में 2 मार्च को आयोजित होने वाले भव्य होलिका उत्सव की तैयारियां भी प्रमुख रूप से सामने आई हैं। यहां 16 फीट ऊंचे होलिका पुतले का निर्माण वानस्पतिक लकड़ियों की श्रृंखला एवं लगभग 5100 गोबर कंडों के समावेश से किया जा रहा है, जिसे पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल और प्रेरणादायक पहल बताया गया है। कार्यक्रम में भक्त प्रहलाद की झांकी, पारंपरिक फाग गायन तथा काशी की ‘मसाने होली’ की तर्ज पर भगवान भोलेनाथ एवं शिवगणों की विशेष प्रस्तुतियां भी निर्धारित हैं।
आयोजन समिति के मुताबिक संध्या 6 बजे से पूजन-पाठ का क्रम प्रारंभ होगा तथा विधिवत मुहूर्त के अनुसार रात्रि 12 बजे के पश्चात होलिका दहन संपन्न किया जाएगा। समिति द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि ग्रहण काल को ध्यान में रखते हुए 3 मार्च को होलिका धुरेड़ी (रंगोत्सव) नहीं खेली जाएगी, जबकि 4 मार्च को सामूहिक रूप से रामलीला रंगमंच में धुरेड़ी उत्सव मनाया जाएगा। यह निर्णय धार्मिक मान्यताओं और परंपरागत आस्था के अनुरूप लिया गया बताया गया है।
स्थानीय सामाजिक सूत्रों के अनुसार इन आयोजनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही/रहने की संभावना है, जिससे क्षेत्र में धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का सकारात्मक माहौल बना। आयोजक समितियों का कहना है कि पारंपरिक पद्धति से होली मनाने से सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होता है और पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ती है। प्रशासनिक स्तर पर किसी अव्यवस्था की सूचना नहीं मिली है और कार्यक्रम शांतिपूर्ण एवं अनुशासित ढंग से संपन्न होने की जानकारी सामने आई है।
दो अलग-अलग स्थलों पर पर्यावरण-अनुकूल होलिका दहन की पहल ने धार्मिक आयोजनों में प्रकृति संरक्षण की अवधारणा को मजबूत किया है। लकड़ी की जगह कंडों के उपयोग से संसाधनों की बचत का संदेश गया, वहीं प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक फाग ने सांस्कृतिक पहचान को भी सुदृढ़ किया। स्थानीय नागरिकों में इस पहल को जागरूक और अनुकरणीय कदम के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में अन्य धार्मिक समितियों को भी पर्यावरण-संतुलित आयोजन अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
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