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न्याय की अनदेखी या प्रशासनिक हठधर्मिता? 24 साल बाद भी शिक्षक खाली हाथ, व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न ।

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मेट्रो सिटी मीडिया | छिंदवाड़ा

 

मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक उदासीनता का एक गंभीर उदाहरण सामने आया है, जहाँ वर्षों से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षक आज भी अपने वैधानिक अधिकारों की प्रतीक्षा करने को विवश हैं। वर्ष 1998–99 में शिक्षाकर्मी वर्ग-2 के रूप में नियुक्त, वर्ष 2010–11 में प्रथम क्रमोन्नति तथा 2012 में वरिष्ठ अध्यापक पद पर पदोन्नत होकर वर्तमान में उच्च माध्यमिक शिक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे शिक्षकों को, नियुक्ति के 24 वर्ष पूर्ण हो जाने के बावजूद अब तक द्वितीय क्रमोन्नति का लाभ प्रदान नहीं किया गया है।

स्थिति तब और भी चिंताजनक हो जाती है, जब यह तथ्य उजागर होता है कि जबलपुर संभाग को छोड़कर प्रदेश के अन्य सभी संभागों में 24 वर्षीय द्वितीय क्रमोन्नति के आदेश जारी किए जा चुके हैं तथा संबंधित शिक्षकों को इसका लाभ भी मिल रहा है। इसके विपरीत जबलपुर संभाग में वरिष्ठ शिक्षकों को इससे वंचित रखा गया है, जिसके परिणामस्वरूप गंभीर वेतन विसंगति उत्पन्न हो गई है। वर्तमान स्थिति यह है कि कनिष्ठ शिक्षक अपने वरिष्ठ शिक्षकों से अधिक वेतन प्राप्त कर रहे हैं, जो न केवल सेवा नियमों के प्रतिकूल है, बल्कि अनुभव, वरिष्ठता और सम्मान की भावना पर भी आघात करता है।

मामले की संवेदनशीलता तब और बढ़ जाती है, जब यह स्पष्ट होता है कि छिंदवाड़ा जिले के उच्च माध्यमिक शिक्षकों ने इस विषय में जबलपुर उच्च न्यायालय से स्पष्ट एवं बाध्यकारी आदेश प्राप्त कर लिए हैं। यह आदेश आयुक्त लोक शिक्षण के लिए पूर्णतः लागू करने योग्य है। इसके बावजूद, शिक्षकों द्वारा विधिवत अभ्यावेदन प्रस्तुत किए जाने के बाद भी आज तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है, जिससे विभागीय निष्क्रियता और प्रशासनिक संवेदनहीनता उजागर होती है।

शिक्षकों का कहना है कि यह प्रकरण अब केवल क्रमोन्नति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि समानता, न्याय और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। एक ही शासन, एक ही विभाग और समान सेवा नियम होने के बावजूद केवल एक संभाग के शिक्षकों के साथ भेदभाव किया जाना, प्रशासन की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

उच्च माध्यमिक शिक्षक संघ, मध्यप्रदेश शिक्षक संघ एवं राज्य शिक्षक संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही द्वितीय क्रमोन्नति लागू कर वेतन विसंगति का निराकरण नहीं किया गया, तो वे न्यायालय की अवमानना याचिका, राज्य स्तरीय आंदोलन एवं मीडिया के माध्यम से व्यापक जनदबाव बनाने के लिए विवश होंगे।

अब यह शासन और शिक्षा विभाग पर निर्भर करता है कि वे समय रहते न्याय सुनिश्चित कर व्यवस्था में विश्वास बहाल करते हैं या वर्षों की निष्ठावान सेवा के बावजूद शिक्षकों को प्रतीक्षा की पीड़ा सहने पर मजबूर करते हैं।

क्योंकि जब कनिष्ठ, वरिष्ठ से अधिक वेतन पाए और अनुभवी शिक्षक 24 वर्षों बाद भी न्याय की बाट जोहता रहे—तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन जाता है।


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