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छिंदवाड़ा: 40 पेटी शराब पकड़ी, पुलिस बोली 27 — कहां गईं बाकी 16 पेटियां?

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छिंदवाड़ा। जिले के देहात थाना क्षेत्र के गुरैया इलाके में पुलिस ने एक बोलेरो वाहन से अवैध अंग्रेजी शराब की बड़ी खेप पकड़ी है। कार्रवाई तो हुई, लेकिन असली विवाद कार्रवाई के बाद शुरू हुआ — मौके पर मौजूद दर्जनों लोगों का दावा है कि वाहन में करीब 40 पेटी शराब थी, जबकि पुलिस रात भर 24 से 26 पेटी होने की बात कहती रही। यानी करीब 14 से 16 पेटी शराब का हिसाब गायब है। इस अंतर ने पूरे क्षेत्र में हलचल मचा दी है और पारदर्शी जांच की मांग तेज हो गई है।

कैसे हुई कार्रवाई?

देहात थाने में पदस्थ आरक्षक सौरभ बघेल को मुखबिर से सूचना मिली कि गुरैया क्षेत्र में एक संदिग्ध वाहन अवैध शराब लेकर जा रहा है। सूचना मिलते ही बघेल ने तत्काल सक्रियता दिखाई और क्षेत्र में घेराबंदी कर एक बोलेरो वाहन को रोक लिया। वाहन की तलाशी लेने पर उसमें भारी मात्रा में अंग्रेजी शराब की पेटियां मिलीं।

बघेल ने फौरन देहात थाना प्रभारी जीएस राजपूत को इसकी सूचना दी। थाना प्रभारी ने मामले की गंभीरता को भांपते हुए एएसआई रघुवंशी को पूरी टीम के साथ मौके पर रवाना किया। इस दौरान स्थानीय लोगों की भीड़ वहां जमा हो गई और पूरे घटनाक्रम को उन्होंने अपनी आंखों से देखा — यही भीड़ आगे चलकर पुलिस के लिए असुविधाजनक सवाल खड़े करने वाली साबित हुई।

चालक की जुबान से निकला बड़ा नाम

पुलिस पूछताछ में बोलेरो चालक ने खुलासा किया कि शराब की यह खेप परतला स्थित अधिकृत शराब दुकान से लोड की गई थी और इसे रोहना क्षेत्र की ओर ले जाया जा रहा था। चालक ने पूछताछ के दौरान परतला शराब दुकान के ठेकेदार राजेश माहोरे का नाम भी लिया।

यहां सवाल यह उठता है कि यदि शराब एक अधिकृत दुकान से ही निकली थी, तो उसका परिवहन अवैध क्यों था? क्या बिना वैध परमिट या दस्तावेज के माल ढोया जा रहा था? या फिर दुकान से ज्यादा स्टॉक निकालकर उसे खुले बाजार में खपाने की तैयारी थी? ये सवाल अभी जांच के दायरे में हैं।

“कुचिया” में बिकनी थी शराब?

स्थानीय सूत्रों के अनुसार रोहना क्षेत्र में एक अघोषित अवैध ठिकाने — जिसे स्थानीय भाषा में “कुचिया” कहा जाता है — पर इस शराब को पहुंचाकर सरकारी मूल्य से अधिक दामों पर बेचने की योजना थी। यह व्यवस्था कोई पहली बार नहीं होती — अधिकृत दुकानों से माल चुराकर या अतिरिक्त स्टॉक निकालकर अवैध ठिकानों पर बेचना शराब माफिया का पुराना तरीका है। हालांकि पुलिस ने इस दावे की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

40 बनाम 27 — असली सवाल यही है

इस पूरे प्रकरण का सबसे विस्फोटक पहलू है बरामद पेटियों की संख्या का विवाद।

मौके पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय निवासियों का स्पष्ट दावा है कि बोलेरो में करीब 40 पेटी अंग्रेजी शराब भरी थी। लेकिन देर रात तक पुलिस की ओर से जो जानकारी सामने आई, उसमें 24 से 26 पेटी का जिक्र था। यह आंकड़ा भी पुलिस की ओर से पहले 22-24 और बाद में 24-27 बताया गया — यानी पुलिस का अपना बयान भी एकसार नहीं रहा।

सीधा गणित यह है कि 14 से 16 पेटी शराब का कोई हिसाब नहीं है।

स्थानीय लोगों के सामने यह शराब पकड़ी गई, उन्होंने खुद पेटियां गिनीं — और अब जब आधिकारिक संख्या कम निकल रही है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि बाकी पेटियां कहां गईं?

सोशल मीडिया ने बदली कहानी?

मामले में एक और रोचक मोड़ है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि पुलिस ने इस कार्रवाई की पुष्टि तब की, जब शराब पकड़े जाने की खबर और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं। यानी सार्वजनिक दबाव बनने के बाद ही कार्रवाई को स्वीकार किया गया। यदि यह सच है, तो यह अपने आप में एक गंभीर सवाल है — क्या बिना वायरल हुए यह कार्रवाई दबा दी जाती?

राजनीतिक हस्तक्षेप और दबाव की चर्चाएं भी क्षेत्र में हैं, हालांकि इन आरोपों की अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

थाना प्रभारी का बयान

देहात थाना प्रभारी जीएस राजपूत ने इस संवाददाता को बताया कि सूचना मिलते ही संबंधित बीट प्रभारियों को मौके पर भेजा गया और नियमानुसार वैधानिक कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की जांच जारी है और तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। शराब की खेप, उसके परिवहन और इससे जुड़े सभी लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है।

लेकिन थाना प्रभारी ने पेटियों की विवादित संख्या और 14-16 पेटी के गायब होने के सवाल पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

जरूरी हैं ये जवाब

इस पूरे मामले में कुछ बुनियादी सवालों के जवाब जनता को चाहिए —

• बोलेरो में वास्तव में कितनी पेटियां थीं — 40 या 24?
• यदि प्रत्यक्षदर्शी सही हैं, तो बाकी 14-16 पेटियां कहां गईं?
• परतला ठेकेदार राजेश माहोरे की क्या भूमिका है और उनसे पूछताछ हुई या नहीं?
• क्या इस मामले में उच्च स्तरीय जांच बैठाई जाएगी?

पृष्ठभूमि

छिंदवाड़ा जिले में अवैध शराब परिवहन कोई नई समस्या नहीं है। अधिकृत दुकानों से माल निकालकर अवैध ठिकानों पर बेचने का यह खेल वर्षों से चलता आया है। जब तक पकड़े जाने वाले माल की संख्या में इस तरह की गड़बड़ी होती रहेगी, तब तक न माफिया टूटेगा और न सिस्टम पर भरोसा बनेगा।

क्षेत्र की जनता पारदर्शी जांच और जवाबदेही चाहती है — और यह मांग पूरी तरह जायज है।


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