वेतन का बोझ भी नही उठा पा रहा छिन्दवाडा नगर निगम, दिवाली में कर्मियों का दिवाला, कामबंद हड़ताल की रणनीति पर कर्मचारी संघ
पहले थे 8 सौ कर्मी अब 2 हजार से ज्यादा

♦छिन्दवाडा मध्यप्रदेश –
करीब दो हजार अधिकारी – और कर्मचारी वाला नगर निगम शहर विकास तो दूर की बात अपने कर्मचारियों को वेतन देने के हालात में नही है। वेतन ना मिलने से नाराज कर्मचारी अब कामबंद हड़ताल की रणनीति में है। संभवत सोमवार को यह हड़ताल हो सकती है। कर्मियों को दो माह से वेतन नसीब नही है। दीपावली महापर्व के सामने होने से कर्मचारी वेतन की राह तकते – तकते अब आक्रोश में आ गए हैं। शुक्रवार को नगर निगम कर्मचारी महासंघ और अधिकारी – कर्मचारी कल्याण संघ ने निगम कमिश्नर को वेतन भुगतान का ज्ञापन देकर हड़ताल की चेतावनी दे दी है।
नगर निगम में करीब दो साल से वेतन भुगतान को लेकर संकट की स्थिति है। हर माह की चुंगी क्षतिपूर्ति और करो की वसूली भी वेतन को कम पड़ रही है। हर माह यहां से ही किसी तरह कर्मियों का वेतन दिया जा रहा है। नगर में विकास नाम का कोई काम नही रह गया है। अतिक्रमण हटाओ से लेकर अवैध कालोनी, तलघरों और दुकानों में ताले जड़ने जैसे काम ही निगम के पास रह गए हैं। नगर निगम में केवल वेतन के टारगेट से ही काम – काज चल रहे हैं। निगम में हर माह वेतन के जुगाड़ लगाने के अलावा कोई काम दिखता नही है।
छिन्दवाडा नगर पालिका से नगर निगम बना है। नगर पालिका के समय नियमित और दैनिक वेतन भोगी कर्मी मिलाकर केवल 8 सौ कर्मी थे। निगम को बने सात साल हुए हैं। इस अवधि में निगम में इन आठ सौ के अलावा 12 सौ कर्मियों का भारी – भरकम बोझ निगम पर बढ़ा है। अब नगर निगम में अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या दो हजार के पार हो गई है। इस बोझ से निगम कर्मियों के ई पी एफ, जी पी एफ का अता – पता नही है। बस दुकाने, आवास बेचने के साथ ही करो की वसूली से केवल वेतन ही दिया जा रहा है।
यहां इतनी बड़ी संख्या में कर्मियों की भर्ती जांच का विषय है। अधिकारी और नेताओ ने भर्ती के नाम पर जमकर वसूली की है और निगम पर थोड़ा बहुत नही बल्कि हर माह का करीब दो करोड़ का बोझ लाद दिया है। निगम में हर माह अकेले वेतन पर करीब साढ़े तीन करोड़ का खर्चा आ रहा है।जबकि नगर निगम इतना सक्षम नही है। बड़ी बात यह है कि नगर निगम में वेतन का व्यय स्थापना व्यय का केवल 65 प्रतिशत से ज्यादा नही होना चाहिए लेकिन यहां 65 नही बल्कि तीन गुना ज्यादा स्थापना व्यय है। जिस पर आडिट आब्जेक्शन तक नही है।
नगर निगम भ्र्ष्टाचार और भर्राशाही का शिकार हैं। नगर निगम अधिनियमों की यह धज्जियां उड़ी पड़ी है। नेताओ की शेखी में नियमो की अनदेखी से नगर निगम का दिवाला निकल रहा है। यही कारण है कि निगम के कर्मी दिवाली मनाने को भी मोहताज है।
नगर निगम के पास नगर में दुकाने – आवास , लीज, संपत्ति कर, जल कर आय के बड़े स्त्रोत है। स्त्रोत आय नगर विकास के लिए होती है। लेकिन यहां स्त्रोत आय निगम निधि से केवल और केवल वेतन दिया जाता है। वेतन को लेकर केवल दीवाली पर यह स्थिति है। ऐसा नही है बल्कि हर माह ही ये हालात होते हैं। इसके बावजूद निगम में अंदर कुछ बाहर कुछ के हालात बने रहते हैं।
नगर निगम को एक अदद कमिश्नर की भी जरूरत है। नेतागिरी के चक्कर मे यहां एक सी एम ओ को कमिश्नर बनाकर बिठा दिया गया है। जो कमिश्नर थे,बतौर प्रशासक सारी व्यवस्था संभालते थे उनका नेतागिरी के चक्कर मे तबादला करवा दिया गया है। निगम में राजनीति का खेल ही जनता का तेल निकाल रहा है। वेतन जुटाने नगर निगम नगर में हर माह दुकानों और तलघरों में जबरन तालाबंदी कर वसूली पर आमादा है। बकायदारों को नोटिस पर नोटिस दिए जा रहे हैं। इन हालातों से जनता भी नगर निगम से त्रस्त हो रही है।

















